शाम कठिन है रात कड़ी है ।
कविता। शाम कठिन है रात कड़ी है ।
बढ़ता चल तू आँख भरी है ।
शाम कठिन है रात कड़ी है ।
मिली देश की जिम्मेदारी
तुमको करना पहरेदारी
हे ! भारत के वीर जवान
तुमसे ही है देश महान
दुर्दिन मे हर रात ढली है ।
शाम कठिन है रात कड़ी है ।।
हिमखण्डों मे होगी ठिठुरन
भूकम्पों से होगी अड़चन
सघन मिलेंगे प्रस्तर खण्ड
दहता होगा। सूर्य प्रचण्ड
पलक झपकते ओस झरी है ।
शाम कठिन है रात कड़ी है ।।
बंजर, कानन, झील, झरीझे
सावधान हो पलते धोखे
अरि छल छद्म लगाए घात
बढ़ता चल होगा प्रभात
निजता के प्रति निशा अड़ी है ।
शाम कठिन है रात कड़ी है ।।
बाहर से आतंकी छाया
अंदर राजनीति की माया
चीन हुआ या पाकिस्तान
ढोंगी की हो गये दुकान
चौतरफ़ा ही गाज गिरी है ।
शाम कठिन है रात कड़ी है ।।
कर्णधार तुम नवनिर्माता
हो भारत के भाग्य विधाता
कुछ दिन सहना और विरोध
ठंडा मत करना प्रतिशोध
ये निर्णय की नही घड़ी है ।
शाम कठिन है रात कड़ी है ।।
राम केश मिश्र
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